Wednesday, 30 September 2020
मन का कुआँ
Tuesday, 29 September 2020
चल जज़्बात बेचते है !
चल जज़्बात बेचते है,
कल तक कौन रुके?
इन्हें आज बेचते है।
रख ' कल ' को गिरवी,
अपना ' आज ' बेचते है।
सवेरे तो बिक ही चुके है सभी के,
जो रातें रह गई है,
वो रात बेचते है |
बहुत कुछ बिक चुका,
अब बहुत कम बाकी है,
जो बिका, जो बचा,
उसका हिसाब कौन रखे,
चल सब बेहिसाब बेचते है |
जो ख़्वाब अमर रहे है हमेशा,
अब उनका यहां काम ही क्या है,
चल वो ख़्वाब बेचते है।
पंखो की कीमत तो लग ही चुकी है,
एक आसमां बचा है यहां,
चल वो आसमां बेचते है |
अपने ज़मीर का कपड़ा बिछाकर,
कुछ उम्मीद रखलो..
कुछ बेबसी..
बातो के खिलौने रखलो..
और अपनी हर हंसी..
वो गम के टुकड़े भी
जो कभी बटें नहीं..
एक ज़िंदा टीस..
जो कभी मिटी नहीं..
अपनी हर सांस..
और तुम खुद।
सब बिकता है संसार के मेले में,
आओ इन्हें सरेआम बेचते है,
चल जज़्बात बेचते है | |
Monday, 7 September 2020
माँ !
वो ठहरा हुआ कैसे है?
Monday, 10 August 2020
काल कोठरी
जब मैं उस अँधेरी काल कोठरी में जाकर खड़ा हुआ तो जो पहले गुप् अँधेरा लग रहा था उसमे मैं आकृतियां भांप पा रहा था। जो कोठरी दूर से इतनी गहरी लग रही थी की मानो मैं इसमें जाऊ तो शयद अपने आप को ही न खो दूँ। मगर उसमे प्रवेश करते ही मैं उसी का हिस्सा बन गया था। मैं देख पा रहा था की वहां सिर्फ डर नहीं था बल्कि ऐसे ढेर सारे एहसास थे जो मैने कभी न कभी महसूस किये हो। उस डर का पल्लू मेरी महत्वकांक्षाओं से बंधा हुआ था। ऐसे ही हर जज़्बात किसी न किसी दूसरे जज़्बात के साथ वहां पल्लू में बंधा था। जैसे दुःख का पल्लू सुख से, बेबसी का परिपूर्णता से, दया का संवेदना से, सकारात्मकता का नकारात्मकता से, और भी बहुत सारे। हर कोई आपस में बंधा है और एक दूसरे की नज़र में एक दूसरे के बंदी है। वे नही जानते के किसने किसको बंदी बना रखा है, महत्वकांक्षाओं ने डर को या डर ने महत्वकांक्षाओ को। वे उस कोठरी से निकल कर बाहर आना तो चाहते है मगर आज़ाद होने का रास्ता नहीं जानते। कभी भूले बिसरे कोई जज़्बात बाहर आकर रौशनी में खड़ा हो भी जाए तो दूसरा पल्लू पकड़ कर उसे वापस अँधेरे में खींच लेता है। असल में ये पल्लू समाज की रूढ़ियों ने हमे दिया है और हम ही है जिसने इन जज़्बातो को पल्लू पकड़ाया एक दूसरे को बाँधने के लिए। अगर हम ये पल्लू इनसे छीन कर फेक दे और उन्हें रौशनी में आने पर सहज एह्साह करवाए तो ये सारे जज़्बात आज़ाद हो जाएंगे। फिर कोई किसी को बाँधेगा या खीचेगा नहीं। हमारी महत्वकांक्षाओ की पतंग फिर किसी डर में लिपट कर नहीं उड़ रही होगी। हर जज़्बात खुद को हल्का महसूस करेगा।
Tuesday, 5 May 2020
मुसाफ़िर !
हर राह मुसाफ़िर चलना है,
Sunday, 26 April 2020
अँधेरा उजाला !
ख्वाब लाखों एक ही रात
में बुन लिया करता हूं मैं,
ये सन्नाट पहरे जो
रातों पर लगे है,
हमदर्द बन इनका हाल
सुन लिया करता हूं मैं।
मैं ढूंढ लेता हूं करार अपना
इन अंधेरों में ही,
उजालों ने कब किसे तवज्जों दी है?
कैसे समेट लेता है ये अंधेरा सब यूहीं,
उजालों में तो बस मशक्कत ही है।
इन काली हवाओं की भीनी खुशबू
मुझे कुछ कह जाया करती है,
वो तारो की धीमी रोशनी
मेरे संग रह जाया करती है,
वो आधा सा चांद जैसे
बादलों से पर्दा करता है,
वो मीठी ठंड का झोंका
मेरी रूह को स्पर्श करता है,
मानो, हर चीज सिर्फ मुझसे
प्यार किया करती है,
शायद इसीलिए,
ये रातें हर बार मुझे
चुन लिया करती है।।







