Wednesday, 30 September 2020

मन का कुआँ

                                                                 Credit:- Well Abstract Painting of  Omaste Witkowski  Source:- www.fineartamerica.com             
 

मैंने सुना था जो बीत गया वह वापस नहीं आता| मगर मुझे लगता है कि जो बीत गया वह घूम कर वापस जरूर आता है| वह एक बार फिर तुम्हें मौका देता है उसको जीने का और खुद तुम्हारी परीक्षा लेता है कि उस वक्त में तुम कितने परिपक्व हो चुके हो| वह फिर तुम्हारी जिंदगी का कुछ हिस्सा ले जाता है हमेशा के लिए और अपना कुछ हिस्सा तुम्हे दे जाता है| जिसको तुम संभाल कर भी रख सकते हो या फिर किसी अंधेरे कुएं में उसे हमेशा हमेशा के लिए फेंक सकते हो| वहां वह किसी के हाथ नहीं लगेगा, तुम्हारे भी नहीं क्योंकि वह अंधेरे कुएं के अंदर का रास्ता ना तुमने कभी देखा है और ना ही तुम कभी उसे देखना चाहोगे| कुएं की गहराई ही उसे रहस्य में बनाती है अंधेरे के भीतर क्या छुपा है, यह हम जान नहीं सकते| लेकिन जब वह तुम्हारी फेंकी हुई चीजों से भरने लगेगा, उसकी गहराई घटकर जमीन से समतल होने लगेगी और उसमें फेंकी हुई चीजों पर सीधी रोशनी पड़ने लगेगी| उस कुएं में पानी कहीं नीचे बहुत नीचे रह चुका होगा, तब तुम्हें सब अपनी खुद की फेंकी हुई चीजें साफ साफ नजर आने लगेगी| वह सब देखकर हो सकता है तुम्हारे अंतर्मन में जज्बातों का प्रवाह सा हो जाए कुछ ऐसे जज्बात भी जिसे तुमने कभी महसूस तक नहीं किया था| तुम्हें भांति तक ना थी कि ऐसा कोई जज्बात किसी के जीवन में घर भी कर सकता है| मगर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उस कचरे में से जिसे तुमने बरसों पहले फेंक दिया था और भुला दिया था| उसमें से तुम्हें कुछ ना कुछ तो काम का मिलेगा ही जो तुम्हें तुम्हारी जिंदगी के कुछ ऐसे पहलू से मिलवा देगा जिसका भ्रमण तुमने पहले कभी नहीं किया था| अब उस कुएं के पास तुम बसर नहीं कर सकते| तुम चाहते हो कि वह खाली हो जाए पहले की तरह और फिर से तुम्हारे कचरे फेंकने के लिए तैयार हो जाए क्योंकि उसमें से अब सड़े गले जज्बातों की भयंकर बदबू आने लगी है जो तुमसे बिल्कुल भी  बर्दाश्त नहीं हो पा रही है| 

हर व्यक्ति एक कुए की तरह होता है| कोई ज्यादा गहरा तो कोई थोड़ा कम, किसी में गुप अंधेरा तो किसी में थोड़ी रोशनी की झलक, कोई एकदम सूखा तो कोई पानी से भरा हुआ, कोई जंजर तो कोई आलीशान| जैसे रास्ते से गुजरते वक्त अगर कोई कुआँ दिख पड़े तो अंदर से तीव्र इच्छा होने लगती है कि कम से कम एक बारी तो उस में झाँक कर देख लिया जाए| फिर हम उस में झाँकते हैं एक उम्मीद लिए कि ऐसा करने के उपरांत हमें सुकून का अहसास मिल सकता है| अगर उसकी वेशभूषा काफी आकर्षक हो और उसकी गहराई भी लाजवाब हो तो वह कुआं हमें उसे काफी देर देखते रहने पर मजबूर कर देता है| यह भी संभव है कि हम उसे मन भर कर देख लेने के बाद भी एक दो बार और देख ले|  मगर वहीं अगर हम ऐसे किसी कुएं में उम्मीद लेकर झाँखे और उसमे कचरा ऊपर तक चुका हो एवं वह एक छोटा गढ्ढा बनकर रह गया हो। तो हम अपना मन सिकोड़ कर वहाँ से आगे चल लेंगे| व्यक्तियों के संबंधों में भी कुछ ऐसा ही होता है|  हम भांति भांति के लोगो से मिलते है| किसी में हम काफी वक़्त तक झाँकते रहते है तो किसी में बस एक झलक मार के पीछे हट जाते है| असल में ये हमारी उत्सुकता है जो हमें ऐसा करने पर मजबूर कर देती है| जिस व्यक्ति में हमें गहराई प्रतीत होती है, उस गहराई को समझने की उत्सुकता हमें उससे जोड़े रखती है| उस गहराई के अंत से आता गुप अंधेरा एक रहस्य को जन्म देता है जो हमें खूबसूरत लगता है| हम उसकी हर एक आकृति को हमेशा के लिए मन में बसा लेना चाहते है मगर ऐसा करने में हम हर बारी नाकाम रहते है| इसीलिए भूले बिसरे हिस्से को फिर से जोड़ने के लिए हम नित्य उसे निहारने आ जाते है।

मगर जब उस कुएं को हम अनावश्यक चीजे से भरने लगते है तो उसकी गहराई को समझौता कर धीरे धीरे खतम होना पड़ता है| उसके धीरे धीरे मिटने की टीस उन लोगो की आंखो में साफ देखी जा सकती है जिनके दिन का अहम हिस्सा उसे निहारने में गुजरा करता था, और उससे भी कई ज्यादा उसकी आंखो में जिस पर यह सब बीत रही हो| ऐसे वक़्त में मन मचल कर उस कुएं के ही इर्द गिर्द घूमता रहता है| अब उन जज्बातों का कचरा साफ करने के दो तरीक़े है| पहला तो ये की हम खुद एक-एक चीज को हाथ से बाहर निकाल फैंके, ऐसे में हमें उन जज्बातों से फिर एकबार मुतारिफ होना पड़ेगा जिनको हमने बरसो पहले पीछे छोड़ दिया था| ऐसा करना उस घुटन से भी ज्यादा पीड़ादायक हो सकता है जो हमें पहले हो रही थी| दूसरा यह कि हम इस कदर छलक जाए कि कुएं का सारा पानी नीचे से उठकर कुएं से बाहर बहने लगे और उस सारे कचरे को समेट कर धरती की गोद में लिप्त हो जाए। ऐसा करने से वो कुआं फिरसे ज़िंदा हो उठेगा| जो आंखे उसके लिए बेचैन थी उनका पानी वाष्प बनकर हवा में उड़ जाएगा और उन्हें चैन की प्राप्ति होगी| 

जीवन एक प्रक्रिया है, जो हर थोड़े समय के बाद एक अलग रूप ले लेती है| यही उसके सौन्दर्य की सबसे महत्वपूर्ण बात है|  हमारा काम यह है कि हम उस प्रक्रिया में रंग भरते चले| जिससे उसकी खूबसूरती हम सबको साफ साफ दिखने लगे और अगली प्रक्रिया पूरी होने का सयंम हम में आ जाए| 

Tuesday, 29 September 2020

चल जज़्बात बेचते है !

 



चल जज़्बात बेचते है,

कल तक कौन रुके?

इन्हें आज बेचते है।

रख ' कल ' को गिरवी,

अपना ' आज ' बेचते है।

सवेरे तो बिक ही चुके है सभी के,

जो रातें रह गई है,

वो रात बेचते है |


बहुत कुछ बिक चुका,

अब बहुत कम बाकी है,

जो बिका, जो बचा,

उसका हिसाब कौन रखे,

चल सब बेहिसाब बेचते है |


जो ख़्वाब अमर रहे है हमेशा,

अब उनका यहां काम ही क्या है,

चल वो ख़्वाब बेचते है।

पंखो की कीमत तो लग ही चुकी है,

एक आसमां बचा है यहां,

चल वो आसमां बेचते है |


अपने ज़मीर का कपड़ा बिछाकर,

कुछ उम्मीद रखलो..

कुछ बेबसी..

बातो के खिलौने रखलो..

और अपनी हर हंसी..

वो गम के टुकड़े भी

जो कभी बटें नहीं..

एक ज़िंदा टीस..

जो कभी मिटी नहीं..

अपनी हर सांस..

और तुम खुद।

सब बिकता है संसार के मेले में,

आओ इन्हें सरेआम बेचते है,

चल जज़्बात बेचते है | |


Monday, 7 September 2020

माँ !




बहुत दूर है वो मुझसे, फिर भी 
कभी-कभी मिलने चला जाता हूँ मैं,
मगर ख्यालो मे,
क्यूँकि बहुत दूर है ना वो मुझसे | 

अक्सर आँख बंद कर,
उसकी गोद में सर रखकर सो जाता हूँ मैं,
मगर ख्वाबो मे,
क्यूँकि बहुत दूर है ना वो मुझसे | 

वो एहसास जो उस डिब्बे मे बंद है,
जो उसने मुझे दिया था घर से जाते वक़्त,
कभी-कभी उसे खोल लिया करता हूँ मैं,
कभी डर लगता है तो,
उसका नाम बोल लिया करता हूँ मैं | 

कभी दिल घबराये,
और कुछ समझ न आये,
तो उसका माथा चूम लिया करता हूँ मैं,
मगर तस्वीरो मे,
क्यूँकि बहुत दूर है ना वो मुझसे | 

सच मे माँ,
तुझे बहुत याद किया करता हूँ,
क्यूँकि बहुत दूर है ना तू मुझसे | 

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P.S:- लेकिन उसका एहसास और स्पर्श हमेशा मेरे साथ है,
        और यही मेरी ताकत है | 



 

वो ठहरा हुआ कैसे है?

                                            Source:New Delhi, India on 7/25/2018 © clicksabhi / Shutterstock

वो ठहरा हुआ कैसे है?
एकदम अडिग खड़ा है,
चहरे की मायूसी भी मानो 
उभरने का एहसान सा कर रही है,
मगर हाँ, कदम एकदम पक्के है,
जैसे कभी गिरेगा नहीं,
और जैसे कभी गिरा ही नहीं | 
हाथो से किस्मत गुम सी है,
आँखों में सपनो का चूरा है,
मानो उसका हर ख्वाब अधूरा है | 
मालूम पड़ता है,
उसने कदमो तले कुछ दबा रखा है | 
भला क्या?
शायद डर, सहमापन, दर्द, मजबूरी, उदासी 
एक मुठी ख़्वाहिश, और 
कुछ भी महसूस न होने का एहसास | 
मुझे हैरानियत अभी तक घेरे है कि.. 
वो ठहरा हुआ कैसे है?